ए खाकनशीनों उठ बैठो

रात ढलने लगी है सीनों में

आग सुलगाओ आबगीनों में

दिले उश्शाक की खबर लेना

फूल खिलते हैं इन महीनों में .

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दरबारे वतन में इक दिन सब जाने वाले जायेंगे

कुछ अपनी सजा को पहुंचेंगे कुछ अपनी जज़ा ले जायेंगे

ऐ खाकनशीनों उठ बैठो वो वक्त करीब आ पहुंचा है

जब तख्त उछाले जायेंगे जब ताज गिराए जायेंगे .

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