दुनिया बदलती है, और उसे बदला जाता है. यह दुनिया कैसे बदलती है, और कैसे इसे बदला जाता है, मार्क्सवाद हमें इसकी समझ देता है. आईये, सबसे पहले जानें कि मार्क्सवाद क्या है. एमिल बर्न्स का 1939 में प्रकाशित मार्क्सवाद क्या है, मार्क्सवादी दर्शन की समझ की बेहतरीन पुस्तक मानी जाती है. यहाँ इसे क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जायेगा. इसके बाद हम भारत के सन्दर्भ में मार्क्सवाद की समझ को पेश करेंगे.
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एमिल बर्न्स
मार्क्सवाद उस संसार का, जिसमें हम रहते हैं और मानव समाज का, जो उस संसार का एक भाग है, एक सामान्य सिद्धांत है. मार्क्सवाद का नाम कार्ल मार्क्स के नाम पर पङम्डा है. कार्ल मार्क्स (1818-1883) ने फ्रेडरिक एंगेल्स (1820-1895) के साथ मिल कर पिछली शताब्दी के मध्य और अंतिम भाग में इस सिद्धांत को विकसित किया. उनकी खोजबीन का उद्देश्य यह पता लगाना था कि मानव समाज का आज जो रूप पाया जाता है, वह ऐसा क्यों है. उसमें परिवर्तन क्यों होते हैं तथा आगे चल कर मनुष्य जाति का किन-किन परिवर्तनों से साक्षात्कार होगा. अपने अध्ययन से वे इस नतीजे पर पहुंचे कि ये परिवर्तन बाह्य प्रकृति में होनेवाले परिवर्तनों की ही भांति अकस्मात नहीं हो जाते, बल्कि कुछ विशिष्ट नियमों के अनुसार होते हैं. इस सत्य की खोज के बाद यह संभव हो जाता है कि मानव समाज के बारे में एक ऐसे वैज्ञानिक सिद्धांत का निरूपण किया जाये, जो मनुष्य जाति के वास्तविक अनुभवों पर आधारित हो और धार्मिक विश्वासों, नस्ली अहंकार और वीर पूजा, व्यक्तिगत भावनाओं या काल्पनिक स्वप्नों के आधार पर बनी हुई समाज के बारे में पहले ही अस्पष्ट धारणाओं ( जो आज भी हैं) से भिन्न हो.
मार्क्स ने इस सामान्य विचार को उस समाज पर-यानी पूंजीवादी ब्रिटेन के समाज पर- लागू किया और इस प्रकार पूंजीवाद के आर्थिक सिद्धांत को खोज निकाला. मार्क्स की सबसे अधिक ख्याति इसी सिद्धांत को लेकर हुई है. परंतु उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि उनके आर्थिक सिद्धांतों को उनके ऐतिहासिक और सामाजिक सिद्धांतों से अलग नहीं किया जा सकता. शुद्ध आर्थिक समस्याओं के रूप में मुनाफे और मजदूरी का एक सीमा तक ही अध्ययन किया जा सकता है, परंतु जो भी व्यक्ति हवाई स्थापनाओं का नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन का अध्ययन करने निकला है, उसे बहुत जल्दी ही इस परिणाम पर पहुंचना पङम्डता है कि मुनाफे और मजदूरी को भी उसी समय पूरे तौर पर समझा जा सकता है, जब मालिकों और मजदूरों, दोनों पर निगाह डाली जाये और इसका मतलब यह होता है कि समाज की उस ऐतिहासिक मंजिल का अध्ययन किया जाये, जिसमें वे रहते हैं.
समाज के विकास की वैज्ञानिक समझ, विज्ञान की दूसरी सभी शाखाओं की तरह ही अनुभव पर, इतिहास के तथा हमारे चारों ओर के संसार के तथ्यों पर आधारित है. अतः मार्क्सवाद पहले से अपने में संपूर्ण और सौ फीसदी तैयार कोई सिद्धांत नहीं है. जैसे-जैसे इतिहास की नयी-नयी परतें खुलती जाती हैं, जैसे-जैसे मनुष्य और अधिक अनुभव प्राप्त करता जाता है, वैसे-वैसे मार्क्सवाद का भी अनवरत विकास किया जा रहा है और उसे उन नये-नये तथ्यों पर लागू किया जा रहा है, जो अब प्रकाश में आते जा रहे हैं. मार्क्स और एंगेल्स की मृत्यु के बाद इस विकास में सबसे महत्वपूर्ण योग देने का काम वीआइ लेनिन (1870-1924) ने किया है.
हर प्रकार के विज्ञान की समझ जिस तरह बाह्य प्रकृति को बदलने के काम आ सकती है, उसी तरह समाज के अध्ययन से प्राप्त हुई वैज्ञानिक समझ भी समाज को बदलने के काम में लायी जा सकती है. परंतु साथ ही, इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि समाज की गति को निर्धारित करनेवाले सामान्य नियम भी उसी प्रकार के नियम होते हैं, जिनसे कि बाह्य प्रकृति का संचालन होता है. दूसरे शब्दों में इन्हीं सामान्य नियमों को, जिनकी सत्ता सार्वभौमिक है और जो इनसानों तथा वस्तुओं, दोनों का ही निर्देशन करते हैं, मार्क्सवादी दर्शन अथवा संसार का मार्क्सवादी दृष्टिकोण कहा जा सकता है.
आगे के अध्यायों में फौरी दिलचस्पी के क्षेत्रों से संबंधित मार्क्सवादी सिद्धांतों की चर्चा की गयी है. परंतु पाठकों को आरंभ से ही यह ध्यान रखना चाहिए कि मार्क्सवाद नैतिकता के किन्हीं हवाई सिद्धांतों पर आधारित होने के कारण मान्यता का दावा नहीं करता, बल्कि मान्यता का दावा वह इसलिए करता है कि वह सच्चाई पर आधारित है. और चूंकि वह सच्चाई पर आधारित है, इसलिए आज के समाज में सबको परेशान करनेवाली बुराइयों और तकलीफों से मानवता को हमेशा के लिए छुटकारा दिलाने तथा समाज के एक उच्चतर रूप की स्थापना करके सभी स्त्री-पुरुषों को अपना पूर्ण विकास करने में मदद देने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है और ऐसा करना हमारा कर्तव्य है.
ज़ारी
